महिला आरक्षण बिल समानता की राह में अंतहीन प्रतीक्षा : सुषमा शुक्ला

0
4

अनूपपुर, ​भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में, जहाँ महिलाएँ अंतरिक्ष से लेकर सीमा सुरक्षा तक हर क्षेत्र में अपनी धाक जमा रही हैं, वहाँ संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी का प्रतिशत एक गंभीर विसंगति है। महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का पारित होने के बावजूद धरातल पर न उतर पाना केवल एक विधायी देरी नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक ढांचे की इच्छाशक्ति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
कांग्रेस नेत्री सुषमा शुक्ला ने कहा है कि ​इस बिल के क्रियान्वयन में हो रही देरी के विरुद्ध कई तर्क दिए जा रहे हैं, जो न्यायोचित प्रतीत होते हैं।

​ बिल को पारित तो कर दिया गया, लेकिन इसके लागू होने को आगामी जनगणना और परिसीमन (Delimitation) से जोड़ दिया गया है। यह शर्त इस ऐतिहासिक कदम को अनिश्चित काल के लिए ठंडे बस्ते में डालने जैसा है। विरोध इस बात का है कि जब अन्य महत्वपूर्ण निर्णय तत्काल लिए जा सकते हैं, तो महिलाओं के हक के लिए “प्रतीक्षा” ही एकमात्र विकल्प क्यों? श्रीमती शुक्ला ने कहा कि भारत की आधी आबादी का नेतृत्व मात्र कुछ मुट्ठी भर महिला सांसदों और विधायकों के हाथ में है। नीति निर्धारण में महिलाओं के नजरिए की कमी के कारण अक्सर लिंग-संवेदनशील (gender-sensitive) कानूनों और योजनाओं में कमी रह जाती है।

​बिल के विरोध या इसमें देरी का एक अंतर्निहित कारण राजनीतिक दलों के भीतर गहरे तक जमी पितृसत्ता है। पुरुष प्रधान नेतृत्व अपनी “सुरक्षित सीटों” को खोने के डर से इस बदलाव को स्वीकार करने में हिचकिचाता रहा है। सुषमा शुक्ला ने कहा कि ​किसी भी देश की प्रगति का पैमाना उस देश की महिलाओं की स्थिति से मापा जा सकता है। केवल वोट बैंक के रूप में महिलाओं का उपयोग करना और निर्णय लेने वाली मेज पर उन्हें जगह न देना ‘छद्म सशक्तिकरण’ है। समाज के हाशिए पर मौजूद वर्गों की महिलाओं के लिए ‘कोटे के भीतर कोटा’ की मांग भी इसी न्याय का हिस्सा है, ताकि आरक्षण का लाभ केवल संभ्रांत वर्ग तक सीमित न रहे। वैश्विक स्तर पर कई छोटे और विकासशील देश महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत से कहीं आगे निकल चुके हैं।

​महिला आरक्षण बिल का पास होना एक जीत तो थी, लेकिन इसका कार्यान्वयन न होना उस जीत को अधूरा बनाता है। लोकतंत्र का मंदिर तब तक पूर्ण नहीं कहलाएगा, जब तक उसकी आधी आबादी को उसका उचित स्थान नहीं मिल जाता। सरकार और सभी राजनीतिक दलों को दलीय राजनीति से ऊपर उठकर, जनगणना और परिसीमन जैसी तकनीकी बाधाओं का समाधान निकाल इसे तत्काल प्रभाव से लागू करना चाहिए।

नर्मदा भूमि के वेबसाइट के कुछ तत्त्वों में उपयोगकर्ताओं के द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली सामग्रियों में समाचार/फोटो/ वीडियो इत्यादि विषय वस्तुएं शामिल होंगी। "नर्मदा भूमि" इस तरह की सामग्रियों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। "नर्मदा भूमि" वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी सामग्री के लिए संवाददाता/ ख़बर देने वाला स्वयं जिम्मेदार होगा। "नर्मदा भूमि" वेबसाइट या उसके स्वामी, मुद्रक, प्रकाशक, संपादक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here