श्री रामचरित मानस की 10 चौपाइयां सुबह सुनने से लो कॉन्फिडेंस होगा दूर

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श्री रामचरित मानस की 10 चौपाइयां सुबह सुनने से लो कॉन्फिडेंस होगा दूर
रामायण काल में जब भगवान श्रीराम की सेना माता सीता को खोजते हुए भारत के दक्षिण भाग में महेंद्र पर्वत (वर्तमान का तमिलनाडु तट) और समुद्र के किनारे पहुंची, तब चारों और फैला अथाह समंदर उसे पार करने की विशाल चुनौती और मन में बार-बार उठता एक ही सवाल इस पार कैसे किया जाए?

सुंदरकांड केवल रामायण का एक अध्याय या कुछ छंदों का संग्रह नहीं है, बल्कि मानव जाति के लिए मनोविज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का भी सबसे बड़ा ग्रंथ है। जब जामवंत जी ने शंखनाद से हनुमान जी की शक्तियों का जगाने का काम किया था, तब हनुमान जी की वो समुद्र यात्रा सिखाती है कि, आकाश छूने की जिद हो तो कोई भी आपको रोक नहीं सकता है।

चौपाई 1- जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
मतलब- जामवंत जी की प्रेरणादायक वचन जिसे सुनकर हनुमान जी के मन में उत्साह और आत्मविश्वास जाग उठा।

चौपाई 2- तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
मतलब- हनुमान जी कहते हैं, हे भाइयों! तुम लोग दुःख सहकर और कन्द-मूल व फल खाकर तब तक मेरी प्रतीक्षा धैर्यपूर्वक करना।

चौपाई 3- जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
मतलब- जामवंत जी से विदा लेते समय हनुमान जी कहते हैं कि, जब तक मैं माता सीता को देखकर वापस नहीं आ जाता, तब तक आप लोग यहीं रुककर मेरी प्रतीक्षा करें। मुझे पूरा विश्वास है कि, प्रभु श्रीराम का यह कार्य पूरा होगा। इसी वजह से मेरे हृदय में हर्ष हो रहा है।

चौपाई 4- यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेऊ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
मतलब: यही कहकर सबको प्रणाम करने के बाद हनुमान जी हृदय में श्रीराम को धारण कर प्रसन्न होकर चल पड़े।

चौपाई 5- सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ाउ ता ऊपर॥
मतलब: समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था, जिसपर हनुमान जी उत्साहपूर्वक चढ़ गए।

चौपाई 6- बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥
मतलब- बार-बार श्रीराम का नाम लेकर अत्यंत शक्ति के साथ छलांग लगाई।

चौपाई 7- जेहि गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
मतलब- जिस भी पर्वत पर हनुमान जी अत्यंत शक्ति के साथ पैर रखकर रहे थे, वो पर्वत पाताल में धंस गया।

चौपाई 8- जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एहि भाँति चलेऊ हनुमाना॥
मतलब- जिस तरह श्रीराम जी का बाण कभी लक्ष्य नहीं चूकता है, वैसे ही हनुमान जी वेगपूर्वक आगे बढ़ रहे थे।

चौपाई 9- जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥
मतलब- समुद्र ने हनुमान जी को श्रीरघुनाथ जी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि, मैनाक, तू इनकी थकावट दूर करने वाले हो, इसलिए उन्हें विश्राम करने में मदद करो।

चौपाई 10- हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ॥
मतलब- हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को प्रणाम कर कहा कि, श्रीराम प्रभु का कार्य किए बिना मुझे विश्राम नहीं करना।

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