बटुरा में फिर खुली मौत की खदानें,प्रशासन की आँखों पर पट्टी-विनोद पाण्डेय*

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अनूपपुर ।अनूपपुर शहडोल जिले के सीमा पर अमलाई और चचाई थाना अंतर्गत बटुरा और बकही गांव में एक बार फिर वही खतरनाक खेल शुरू हो गया है कोयले की काली कमाई के लिए जिंदगी से खिलवाड़। जिन अवैध खदानों को प्रशासन ने मौतों के बाद बंद करवाया था, वे अब फिर खुल गई हैं। फर्क बस इतना है कि अब यह सब कुछ खुलेआम, नेशनल हाइवे के किनारे हो रहा है। झुग्गियां डालकर दिन-रात खुदाई, ट्रैक्टरों और पिकअपों से कोयले की सप्लाई, और प्रशासन मूक दर्शक।यह दृश्य केवल अवैध खनन का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की नाकामी और मिलीभगत का भी आईना है। आखिर बिना संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर खुदाई और परिवहन संभव कैसे है? कोई भी जिम्मेदार अधिकारी यह नहीं देख रहा कि मौत की वो खदानें फिर से सांसें निगलने को तैयार हैं?बटुरा की इन खदानों में पहले भी कई निर्दोष मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं। वे गरीब थे, मजबूर थे, पर उनकी मौतों ने भी शासन को नहीं झकझोरा। कुछ दिन का दिखावटी बंद, कुछ प्रेस नोट, और फिर वही पुराना धंधा चालू। यह न सिर्फ कानून का मखौल है, बल्कि मानव जीवन की कीमत पर चल रहा अपराध है।यह सवाल अब उठना चाहिए क्या प्रशासन सच में अनजान है या जानबूझकर आँखें मूँदे हुए है? क्या कोयले की यह काली कमाई कुछ सफेद कुर्सियों तक नहीं पहुँचती? सरकार और स्थानीय प्रशासन को जवाब देना होगा कि आखिर बटुरा,बकही में कानून किसके लिए है। अगर खदानें फिर खुल गई हैं, तो किसकी अनुमति से? अगर नहीं खुलनी चाहिए थीं, तो कार्रवाई कहाँ है?बटुरा,बकही गांव अब इस बात का प्रतीक बन चुका है कि जब व्यवस्था सो जाती है, तो अपराध शासन करने लगता है। और जब मौतें आम बात बन जाएं, तो समझ लीजिए कि इंसानियत अब आंकड़ों में गिनी जाने लगी है।वक्त है कि शहडोल प्रशासन दिखावे की बजाय सख्ती दिखाए। वरना अगली खबर फिर किसी मजदूर की मौत की होगी और इस बार जिम्मेदार केवल वही नहीं होंगे जो खदान में फावड़ा चला रहे हैं, बल्कि वे भी जो अपनी कुर्सियों पर बैठे सब कुछ देखकर भी कुछ नहीं कर रहे।

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